एकादशी व्रत (Ekadashi Vrat) की चर्चा हिन्दू संस्कृति में प्राचीन काल से होती रही है और इसके महात्म्य का भी। एकादशी शब्द संस्कृत से आया है जिसे संख्या के रूप में देखें तो ११ वे दिवस का बोध होता है। हिन्दू पंचांग में पूरे महीने को दो पक्षों में बांटा गया है कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष। प्रत्येक पक्ष १५ दिनों का होता है और हर पक्ष का ११ वां दिन एकादशी का दिन होता है
इस प्रकार एक पूरे वर्ष के बारह महीने मैं २४ एकादशी होते हैं / एकादशी का दिन बहुत पवित्र और आराधना के लिए उपयुक्त दिन माना जाता है। ऐसी मान्यता सदियों से सनातन संस्कृति में रही है और इसका उल्लेख धार्मिक ग्रंथो में भी बहुतायत से है।
एकादशी व्रत क्या है ?
एकादशी व्रत एक साधना है जिससे आप अपने इष्टदेव को स्मरण करने के लिए एक नियम से गुजरते हैं ताकि आपके साधना में कोई भूल चूक न हो। पुरे वर्ष में २४ एकादशी होता है और सभी का सनातन धर्म के अनुसार सभी का अपना अलग – अलग महत्त्व होता है उसका नियम भी।
एकादशी व्रत एक कठिन साधना के तौर पर देखा जाता है जिसमें अपने इष्टदेव को प्रसन्न करने के लिए कई प्रकार के परहेज और सावधानिया ली जाती है। पूरे वर्ष में १२ महीने होते हैं और हर महीने २ एकादशी होती हैं। इन २४ एकादशी के प्रकार और स्वरुप भी अलग हैं। पुनश्च प्रत्येक एकादशी के लक्ष्य और निहितार्थ भी अलग अलग है और उनको करने के नियम भी .
एकादशी व्रत विशेष रूप से भगवान् विष्णु के लिए किया जाता है इस व्रतियां उपवास रखती हैं सूर्योदय से सूर्यास्त के बिच के समय में अपने नियमो का पालन करते हुए व्रतधारी जल को ग्रहण कर सकते हैं या तो नन्ही ये निर्भर करता है कि किस तरह का व्रत कर रहे हैं निर्जला व्रत या फिर फलाहार।
जैसे की आपको पता होगा की हिन्दू संस्कृति में पर उपवास, व्रत या अनुष्ठान किसी न किसी विशेष आराध्यदेव के लिए किया जाता है। इस सन्दर्भ में एकादशी व्रत भी एक खाश भगवान् को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है।
एकादशी व्रत में भगवान् विष्णु आराध्यदेव होते हैं जिसमें व्रतधारी सूर्योदय से सूर्यास्त तक का उपवास करते हैं। उपवास के पश्चात् कुछ व्रती नियमों का पालन करते हुए जल ग्रहण करते हैं तो अन्य कुछ भी ग्रहण नहीं करते हैं। वस्तुत : ये इस बात पर निर्भर करता है कि कोई व्रती निर्जला एकादशी कर रहा या फलाहार।
जो व्यक्ति निर्जला व्रत करते हैं वे सूर्योदय होने के पश्चात सुबह से शाम तक अपने सभी नियमों क पालन करते हुए पूजा को पूरा करेंगे और दूसरे दिन के सूर्योदय होने पर ही जल ग्रहण कर सकते हैं। जो व्यक्ति फलहारी करते हैं वे अपने पूजा को समाप्त करने के पश्चात जल के साथ फल का सेवन कर सकते हैं लेकिन उस दिन किसी भी तरह का अशुद्ध यानी मांसाहारी भोजन नहीं कर सकते हैं अन्यथा उनके पूजा को असफल माना जाता है।
एकादशी व्रत कैसे प्रारंभ हुआ?
वैदिक युग से ही भारत में प्रत्येक कार्य को धर्म और पुण्य से जोड़कर करने की प्रथा चला आ रहा है। व्यक्ति से किसी भी कार्य को मन, वचन और कर्म से करवाने के लिए उसे धर्म से जोड़ा गया। फिर चाहे व्यक्ति को मनोवांछित फल कि प्राप्ति करनी हो अथवा समाज कल्याण। ऐसा मान्यता है कि एकादशी व्रत का महत्त्व स्कंदपुराण और पद्म पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में इसका वर्णन किया गया है।
इस संबंध में पद्म पुराण में कथा है कि एक बार पुण्यश्लोक धर्मराज युधिष्ठिर को लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त दुःखों, त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने, हजारों यज्ञों के अनुष्ठान की तुलना करने वाले, चारों पुरुषार्थों को सहज ही देने वाले एकादशी व्रत करने का निर्देश दिया।तभी से एकादशी व्रत का आरम्भ माना जाने लगा है। एकादशी को ‘ हरी वसारा ‘ और ‘ हरी दिवस भी’ कहा जाता है।
चूँकि भारत में सनातन धर्म को राष्ट्र धर्म के रूप में माना जाता है।सनातन धर्म के अनुसार हिन्दू का भी दो वर्ग है वैष्णव समुदाय और गैर वैष्णव समुदाय। एकादशी व्रत दोनों समुदाय द्वारा किया जाता है। इस व्रत को करने वाले व्यक्ति के लिए उसके खान पान से लेकर उसके पूजा पध्दति का विधि विधान भी निश्चित किया गया है।इस व्रत को रखने वाले भक्त अनाज, गेहूं, मसाले और ज्यादातर सब्जियों का सेवन करने से बचते हैं।
एकादशी व्रत का महत्त्व :–
आप तो जान चुके हैं कि इस व्रत को वैष्णव और गैर वैष्णव दोनों समुदायों द्वारा मानाया जाता है। हर व्रत को मनाने का कई महत्त्व होता है परन्तु मुख्य रूप से आप देखें तो कुछ इस प्रकार है :–
(1) ऐसी मान्यता है कि आप चाहे जितने भी हवन, यज्ञ या कर्मकांड कर लें लेकिन इन सबसे अधिक फल कि प्राप्ति आपको एकादशी व्रत को करने से प्राप्त होता है।
(2) हिन्दू संस्कृति के अनुसार पूर्वज अथवा पितरों के आत्मा की शान्ति के लिए उनके नाम से कई पूजा पाठ करवाई जाती है परन्तु यह भी मान्यता है यदि आप एकादशी व्रत की कथा करते हैं तो आपके पूर्वजों अथवा पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत करने का फायदा:–
आप जब भी कोई कार्य करते हैं तो उसका परिणाम भी जरूर चाहते हैं आपके हर कार्य में आपका उद्देश्य निहित होता है। आज आप जान पाएंगे कि एकादशी व्रत करने आपको क्या क्या फायदा हो सकता है जो निम्नलिखित है :–
सकारात्मक ऊर्जा मिलती है और व्यक्ति निरोगी हो जाता है।
पापों का नाश और संकटों से मुक्ति मिलती है।
आपके सर्वकार्य की सिध्दि होगी।
सौभाग्य एवं मोक्ष को प्राप्ति होती है।
दरिद्रता से छुटकारा एवं धन की समृद्धि होती है।
शत्रुओं का नाश एवं कीर्ति व् प्रसिध्दि की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत करते समय ध्यान रखने योग्य महत्त्वपूर्ण बातें:–
- उपवास करने से एक दिन पहले(१० वीं) को नहाय खाय के अर्थात शुद्ध भोजन किया जाता है
- नहाय खाय के दिन प्याज , लहसुन , बैगन उड़द दाल तथा मांसाहारी जैसे चीजों को खाना वर्जित माना जाता है क्योंकि इसे अशुद्ध भोजन का माना जाता है।
- शराब और मांसाहारी भोजन के सेवन से पूरी तरह से बचा जाना चाहिए।
- उपवास के दिन झाड़ू नहीं लगाना चाहिए ताकि झाड़ू करते समय आपके हाथों से कहैं किसी सूक्ष्म जिव कि हत्या न हो जाए।
- उपवास के दिन आपको किसी से दुर्व्यवहार नहीं करना चाहिए ताकि आपके वजह से किसी को पीड़ा न पहुंचे।
- ताजे फल, सूखे मेवे, सब्जियां, नट्स और दूध उत्पाद आदि पदार्थों का सेवन करना चाहिए ।
- प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए।
- एकादशी को प्रात: काल उठकर भगवान् से प्रार्थना कर दिनभर के लिए उपवास रखते हैं तथा संध्या समय को अनुष्ठान के रूप में पूजा एवं आरती वंदना करते हैं।
- इसके साथ ही एकादशी व्रत कि कथा का पाठ स्वयं करते हैं अथवा पुरोहितों के माध्यम से सुनते हैं.
- एकादशी के दिन पुरोहितों अथवा जरूरमंद व्यक्ति को दान दक्षिणा देने से आपको पुण्य तथा आशीर्वाद की प्राप्ति होती है।
एकादशी व्रत का पारण अथवा उद्यापन :—
जब कभी भी किसी अनुष्ठान को समाप्त करने के पश्चात दूसरे दिन हमें भोजन ग्रहण करना होता है तब वह पारण अथवा उद्यापन कहा जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी को ही किया जाता है। उद्यापन के दिन अनुष्ठान का अंतिम दिन होता है उस दिन हम ब्राह्मण तथा जरूरतमंद को भोजन करवाते हैं तथा उन्हें अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिणा भेंट करते है। अनुष्ठान समाप्ति के पश्चात् दान करना शुभ माना जाता है . हम अपने इष्टदेव के अतिरिक्त ब्राह्मणों से भी आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
भारत में प्रत्येक महीने एकादशी व्रत मनाया जाता है और हर महीने में उसका नाम और महत्त्व भी अलग है जिसे आप निम्नांकित रूप में देख सकते हैं :––
क्र. सं. | नाम | दिनांक | दिन |
1 | पौष पुत्रदा एकादशी | 2 जनवरी 2023 | सोमवार |
2 | षटतिला एकादशी | 18 जनवरी 2023 | बुधवार |
3 | जया एकादशी | 1 फरवरी 2023 | बुधवार |
4 | विजया एकादशी | 16 फरवरी 2023 | गुरुवार |
5 | आमलकी एकादशी | 3 मार्च 2023 | शुक्रवार |
6 | पापमोचिनी एकादशी | 18 मार्च 2023 | शनिवार |
7 | कामदा एकादशी | 1 अप्रैल 2023 | शनिवार |
8 | वरुथिनी एकादशी | 16 अप्रैल 2023 | रविवार |
9 | मोहिनी एकादशी | 1 मई 2023 | सोमवार |
10 | अपरा एकादशी | 15 मई 2023 | सोमवार |
11 | निर्जला एकादशी – | 31 मई 2023 | बुधवार |
12 | योगिनी एकादशी | 14 जून 2023 | बुधवार |
13 | देवशयनी एकादशी | 29 जून 2023 | गुरुवार |
14 | कामिका एकादशी | 13 जुलाई 2023 | गुरुवार |
15 | श्रावण पुत्रदा एकादशी | 27 अगस्त 2023 | रविवार |
16 | अजा एकादशी | 10 सितंबर 2023 | रविवार |
17 | परिवर्तिनी एकादशी | 25 सितंबर 2023 | सोमवार |
18 | इन्दिरा एकादशी | 10 अक्टूबर 2023 | मंगलवार |
19 | पापांकुशा एकादशी | 25 अक्टूबर 2023 | बुधवार |
20 | रमा एकादशी | 9 नवंबर 2023 | गुरुवार |
21 | देवोत्थान एकादशी | 23 नवंबर 2023 | गुरुवार |
22 | उत्पन्ना एकादशी | 8 दिसंबर 2023 | शुक्रवार |
23 | मोक्षदा एकादशी | 22 दिसंबर 2023 | शुक्रवार |
24 | सफला एकादशी | 2023 में सफला एकादशी नहीं है. | |
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