जब व्यक्तिगत दंभ और उसे साबित करने की होड़ मातृत्व पर भारी पड़ जाय।

एक उच्च- शिक्षित माँ अपने ही बच्चे की निर्मम हत्या कर देती है और उसके व्यवहार में कोई पश्चाताप नहीं दिखता।

जी हाँ। सूचना सेठ से जुडी मुख्य धारा मीडिया में की जा रही रिपोर्टिंग की बात कर रही हूँ।

यह एक ऐसी वारदात है जिसमे मातृत्व हार जाता है निजी इगो एवं हताशा के आगे। या, यूँ कहें कि मातृत्व इतना कमजोर था कि अहं तथा हताशा ने उसका क़त्ल कर दिया।

क़त्ल बच्चे का नहीं हुआ, कत्ल ममत्व का हुआ है, क़त्ल एक माँ के अन्दर प्राकृतिक रूप से मौजूद अपने बच्चे के लिए ममता का हुआ है। क़त्ल उस नैसर्गिक गुण- धर्म का हुआ है जो हर स्त्री में दैवीय रूप से पायी जाती है।

इस वारदात से यह बात झूठी हो चली है कि “माँ का निर्माण एक बच्चे के जन्म से होता है ( A child gives birth to a mother)”। इस घटना ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि, बच्चे के जन्म लेने के बाद भी स्त्री चाहे तो अपने विकृत भावनाओं का त्याग नहीं करेगी। और, बल्कि अपने अहम की तुष्टि के लिए जरुरत पड़े तो मातृत्व को ही तिलांजलि दे देगी।

मेरा यह आलेख केवल स्त्री जाति को अधमा दिखाने के उद्देश्य से नहीं प्रकाशित हुआ है बल्कि इस बात को साबित करने के लिए है कि माँ का नैसर्गिक ममत्व अगर अहं की भेंट चढ़ सकता है तो पुरुष जाति के लिए तो यह और भी आसान सी बात है।

मैंने एक माँ को ट्रक के पहिये तक को उठाते सुना है, अपने बच्चे को बचाने हेतु। एक माँ को भूखे शेर के सामने खुद को परोसते सुना है जिससे कि उसका बच्चा शिकार न बन जाय। किन्तु हालिया घटना मानवता को शर्मसार करने जैसा है जिसकी कल्पना एक उपन्यासकार भी अपने प्लाट में शायद न करे अपने उपन्यास की बिक्री बढाने के लिए।

सूचना सेठ से जुडी हालिया रिपोर्टिंग को संगीन क़त्ल की श्रेणी में रखना ज्यादा उपयुक्त है और यह एक साथ हमारे सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षिक एवं संस्थागत खोखलेपन को उजागर करता है।

बच्चे की मां सूचना सेठ एक AI Scientist है और बाप वेंकट रमण भी टॉप सैलरी ब्रैकेट में आता है। शादी 2010 में हुई थी, बच्चे का आगमन 2019 में हुआ था।

लेकिन जिस खुशहाल जिंदगी की आस में दोनो ने अपने व्यक्तिगत स्तर पर परिश्रम करके मंजिले पाई, वह सब चार साल से बिखरता हुआ अधोगति के चरम पर पहुंच गया। इनके बीच डिवोर्स प्रोसीडिंग्स बच्चे के जन्म के ठीक बाद लगभग शुरू हो गयी थी।

यद्यपि यह कोई इकलौता उदाहरण नही है जहां दो highly qualified professionals ki शादियां टूटी हों लेकिन पेरेंट्स के मानसिक तनाव का असर बच्चे की जान पर भी बन आए, यह शायद ही सुना हुआ है।

जो कुछ अभी तक सामने आया है उसका वृहत अभिप्राय यह है कि केवल प्रोफेशनल पढ़ाई, समाज को खुशहाल नही बना सकती। ये पढ़ाई जोड़ती कम है, तोड़ती ज्यादा है।

कुछ कारण दीगर हैं:

१. शादी बिना पेरेंट्स के इनवॉल्वमेंट के हुई थी।

२. शादी के जारी रहने या टूटने में इनके परिवार का कोई इंटरवेंशन नही लग रहा।

३. डायवोर्स के बाद के लाइफ में भी पेरेंट्स का इन्वॉल्वमेंट इनके जीवन में नही दिख रहा।

४. क्रॉस कल्चर, क्रॉस ज्योग्राफिक शादी हुई थी।

५. दोनो ही, समाज संकृति और परिवार से कटे दिख रहे हैं। इनकी दुनिया अलग रही है, mainstream समाज से बिल्कुल अलग।

सामाजिक, पारिवारिक, शैक्षिक एवं संस्थागत खोखलेपन की पोल

हमारी आज कि शिक्षित पीढ़ी यह बात अक्सर बोलते और लिखते हुए देखी जा सकती है “marriage is an institution and that has to be respected” इतना लिखने के बाद वे अपने संभावित पति/पत्नी को और भी आगे लिखेंगे “Do you really believe in family values?”. मैं पूरे दावे के साथ कह सकती हूँ कि इनमे से ज्यादातर को न ही institution और न ही Indian Value System का पता होता है। शाब्दिक अर्थ शायद ये समझ रहे होते हैं लेकिन हिंदी के “संस्था” और “संस्कार” का वास्तविक अर्थ इनको मालूम नहीं होता।

शादी अगर तथाकथित पीढ़ी लिए एक संस्था है तो उसको संस्थागत तरीके से प्रारम्भ क्यों नहीं करते। एक संस्था में सैकड़ो हजारो वर्षो की पीढ़ियों के अनुभव समाहित होते हैं। उस अनुभव का इस्तेमाल वे अपने माता-पिता एवं परिवार की सहायता से रिश्ते शुरू करने और उसे सींचने में क्यों नहीं करते।

सूचना एवं वेंकट ने संस्था निर्माण की कोशिश तो की थी लेकिन संस्था के सिद्ध मानवीय मूल्यों की सहायता नहीं ली।

हमें पता है कि आधुनिक वाहनों के पहिये गोल बनाये जाने से पहले हजारो प्रयोग हो चुके हैं मानव सभ्यता के द्वारा तो फिर, उसको हम वर्गाकार बनाने का प्रयोग ही क्यों करते हैं? यह हास्यास्पद है या नहीं? वाहन के तेज भागने के लिए पहिये का गोल रहना संस्थागत सिद्धि है जिसकी शुरुवात भले ही व्यक्तिगत स्तर पर पाषाण युग में हुई हो।  

सूचना एवं वेंकट के वैवाहिक जीवन को देखते हुए ऐसा लगता है कि इन्होने पहिये के आकार को भी बदलने की कोशिश की है।

हमारे शैक्षिक संस्थानों कि भी एक विडंबना है कि उच्चतर डिग्रियों में केवल स्पेशलिटी सब्जेक्ट में ही कौशल की जाँच परीक्षा होती है। जीवन के असली चुनौतियों का सैधांतिक पेपर भी नहीं होता उनमे। आप कैसे भूल सकते हैं कि डिग्री ख़त्म होने के बाद लगभग हर विद्यार्थी को परिवार और समाज का अभिन्न अंग बनकर ही जीने की जरुरत पड़ेगी। मनोविज्ञान और रिश्तों के विज्ञान, जो जीवन को असल में खुशहाल बना सकते हैं, को अनिवार्य विषय रखा ही जाना चाहिए एक खुशहाल समाज के निर्माण के लिए।

वारदात के वर्तमान प्रसंग में दम्पति की डिग्रियों से प्रतीत होता है कि उनकी अकादमिक उपलब्धियां यांत्रिक ज्यादा हैं, मानवीय कम।

अगर हम वर्तमान न्याय प्रणाली कि बात करें तो इसमें कई संस्थागत खामियां हैं जिनका असर हमारे सम्पूर्ण वेल- बीइंग पर पड़ता है। न्याय पाने में समय बहुत ज्यादा लगता है। पूरी मशीनरी यंत्र की तरह काम करती है। साक्ष्य के उपलब्ध करवाने या नहीं करवा पाने पर ही सब कुछ निर्भर करता है। एक लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद अगर कोई पीड़ित अपेक्षित कोर्ट जजमेंट हासिल भी कर ले तो भी उसके सम्पूर्ण नुकसान की भरपाई संभव नहीं होती है।

अनुसन्धान से जो कुछ अभी तक पता चला है ऐसा लगता है कि न्याय प्रणाली के पास उनके आदेश आदेश के प्रभाव को मापने और उसमें यथोचित संशोधन की कोई व्यवस्था नहीं है।

क्या खुलासे हैं अभी तक अभियुक्त की ओर से?

सूचना सेठ अभी तक एडमिट नहीं कर रही है कि उसने बच्चे की क़त्ल की है और अपराध अनुसन्धान टीम, प्राप्त साक्ष्यों की सहायता से सूचना सेठ को confront कर रही है ताकि जुर्म का कोई तार्किक निष्कर्ष निकल सके।

अपराध अनुसन्धान टीम को उस संदूक से एक टिश्यू पेपर मिला है जिसमे बच्चे की लाश लेकर सूचना सेठ गोवा से बैंगलोर आ रही थी। टिश्यू पेपर पर आईलाइनर की सहायता से  एक कुछ आड़े तिरछे लिखावट (scribbling) मिली है जो संभवतः सूचना सेठ की ही लिखी हुई है।

इसमें यह लिखा हुआ है कि, कोर्ट और उसके पति दोनों ही उसपर दबाव बना रहे हैं कि बच्चे को हर रविवार उसके पिता से मिलने दिया जाय और इसे वह बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकती क्योंकि उसके पति बच्चे को गलत आदते सिखा रहे हैं।

सूचना के पति वेंकट ने भी पुलिस को अपने स्टेटमेंट्स रिकॉर्ड करवाते हुए लगभग इसी दिशा में संकेत दिया है कि सूचना सेठ संभवतः कोर्ट के आदेश और बच्चे से मिलवाने के मेरे आग्रह को पचा नहीं पा रही थी।

माँ का प्यार कैसा होता है?

दो माताएं राजा के दरबार में पहुचती हैं एक बच्चे को साथ लिए और दावा पेश करते हुए कि यह बच्चा मेरा है:

राजा ने दोनों के तर्क सुने लेकिन उसकी समझ में एक नहीं आया कि फैसला किसके पक्ष में सुनाये क्योंकि दोनों के ही तर्क बराबर रूप से प्रभावशाली लग रहे थे।

मन्त्री ने राजा के कान में कुछ बुदबुदाया और फिर राजा ने फैसला सुनाया। “इस बच्चे को बीचोबीच काट दिया जाय और आधा- आधा हिस्सा दोनों माताओं को सुपुर्द किया जाय। हुक्म का पालन हो और मामले को निस्तारित समझा जाय।”

एक महिला यह सुनते ही राजा की पाँव पड़ने लग गयी कि उसे नहीं चाहिए बच्चा वह संतोष कर लेगी वहीँ, दूसरी महिला के चेहरे पर विजय के भाव दिख रहे थे और वह अत्यंत उत्साहित होकर राजा का धन्यवाद करने लगती है।

यह देखते हुए राजा का अगला हुक्म होता है कि धन्यवाद् करने वाली महिला को जेल दिया जाय और दूसरी को बच्चा सौंपा जाय क्योंकि वही बच्चे की असली माँ है।

यह किम्वदन्ती संभवतः उस काल खंड से ताल्लुक रखती है जब हमारी शिक्षा का स्तर बहुत निम्न था, खास तौर पर स्त्रियों का।

लेकिन जो मानव सहज संस्कार और गुण हैं उनका स्तर बहुत ऊँचा था तब। भाव और भावनाएं संभवतः मिलावट रहित थीं। माताएं, सहज माताएं थीं, पिता सहज पिता थे। वस्तुतः सारे रिश्ते सहज हुआ करते थे; उनपर छद्म, प्रपंच, अहं, व्यावसायिकता, उपभोक्तावाद या किसी भी पाश्चात्य विकृति का प्रभाव नहीं था।

व्यावसायिकता एवं उपभोक्तावाद से मूल्यों का ह्रास:

भारतवर्ष के मौलिक सोच में माँ और मातृभूमि का एक विशिष्ट स्थान रहा है।  “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” का श्लोक हम ज्यादातर लोग सुनते आये हैं।  इसका अर्थ है कि माँ और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढकर हैं। भावार्थ है कि इन दोनों के लिए कुछ भी करना पर्याप्त नहीं है जिसमे प्राणों की आहुति सम्मिलित है।

लेकिन क्या कारण है कि हमारी सेना में ऑफिसर्स ग्रेड में बहुत सारी रिक्तियां हैं? हाल के वर्षो में हमारी सोच असल में कुछ ज्यादा ही उपभोक्तावादी और व्यावसायिक हो गयी है। हम अपने बच्चों को अच्छे इंसान बनने पर खूब जोर देते हैं, उनको अच्छे से अच्छा स्कूल में दाखिला दिलवाते हैं। लेकिन उसको सेना का अफसर बनाने के लिए तैयार नहीं करते बल्कि उसको बाज़ारवाद के लिए तैयार करते हैं।

कुछ राज्यों के तो गरीब लोग भी अपने बच्चे को सेना में बही भेजना चाहते। और आंकड़े बताते हैं कि ये राज्य वे हैं जहाँ व्यापार ही धर्म है और बस उसी का खून उनमे दौड़ता है ।

लेकिन कुछ हिंदी भाषी राज्यों से शहीद हुए सैनिको की माँओं को हमने हाल में ही कहते हुए सुना है कि हमारा छोटा बेटा भी तैयार है शाहदत के लिए।

उन विधवावों को सुना है कहते हुए कि मेरे शहीद पति का शेर बच्चा अभी से सेना में जाने किए लिए तैयार है।

हमने कभी नहीं सुना है कि सीमा पर शहीद की विधवा ने शाहदत की खबर पाकर अपने छोटे से बच्चे को गला घोटकर मार दिया हो क्योंकि शहीद सैनिक से उसकी पत्नी बहुत नाराज चल रही थी। आखिर सीमा पर तैनाती के बाद से सैनिक बीवी बच्चों से मिलने का वादा भी तो तोडा था!

ऐसा लगता है कि सेना के माध्यम से देश सेवा का जिम्मा हमारे समाज के कुछ ही हिस्सों ने अपने सर पर ले लिया है। और कुछ ही युवा जीवन भर इसे निभाने के लिए बने हैं।

हाल के वर्षो में हमारी सोच जिस प्रकार से सेना को लेकर बदले हैं उनको मैं एक वृहत मूल्य ह्रास का एक हिस्सा समझती हूँ।

क्या होता यदि परिस्थितियां मूल्यों के अधीन होते

खुद सूचना या सूचना का पति भी सेना में अफसर होते तब यह हादसा नहीं होता। ये कॉरपोरेट जगत में काम वाले कभी नहीं समझ पाएंगे कि पति, पत्नी और बच्चे के बीच रिश्ते “अटेंशन और केयर” से नहीं चलते बल्कि संस्कारों और नैतिक मर्यादाओं से चलते हैं।

संस्कार और नैतिक मूल्य केवल एक परिवार को नहीं बचाते वरन उनमें पूरे समाज को भी बांध कर रखने क्षमता होती है। प्रजातान्त्रिक देश में आज़ादी सब तरह की मिले लेकिन सेना जैसी कुछ सर्विसेज को हर युवा के लिए आवश्यक शर्त बनानी चाहिए कही भी रोजागर पाने और कोई भी व्यवसाय खड़ा करने के लिए।

सेना में कुछ वर्षो की आवश्यक सेवा की मेरी सोच  “जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी” के एक श्लोक मात्र का विस्तारण है। वस्तुतः, ऐसे जो भी स्थापित मूल्य हैं उनपर शोध करके, हर एक युवा को आवश्यक रूप से उन मूल्यों को जीने का scope सरकार की रोजगार नीति में शामिल करना चाहिए। जबतक आप किसी सिद्दांत को जीते नहीं तबतक आप सीखते नहीं।

निष्कर्ष

युवाओं की शिक्षा और उनके रोजगार कार्य समाज की दशा एवं दिशा दोनों तय करते हैं। सहज एवं स्थापित मूल्यों को जीवन में उतारने के लिए सरकार की नीतियों में बदलाव की आवश्यकता के लिए मेरा सुझाव केवल सांकेतिक है इसका वास्तविक विस्तारण एक बड़ा शोध का कार्य हो सकता है। शोध संभवतः यह भी साबित कर सकेगा कि जहाँ नीतियों को थोपने की जरुरत है वहां थोपा भी जाय। उदारहण के तौर पर संविधान के कुछ तत्त्व जो पहले नीति निर्देशक श्रेणी में आते थे आज बाध्यकारी बना दिए गए हैं विधान पारित करके।

अस्तु! यह तो स्पष्ट है कि समाज में कई अनपेक्षित गिरावटे आई हैं जिसके चलते अनपेक्षित घटनाये देखने को मिलती हैं।

सभ्यता में आई इस गिरावट के मद्देनजर भारत को राम- मय बनाने का जो प्रयास चल रहा है उसकी प्रासंगिकता इस बात में है, कि हम अपनी मौलिक संस्कृति और मूल्यों के छांव में जीएं तो ज्यादा खुशहाल समाज बना पाएंगे। मानसिक दिवालियापन और नैतिक पतन को रोका जा सकेगा कदाचित। राम राज्य की संस्कृति अगर हमारे दिनानुदिन कार्य में सम्मिलित हो सके तो हम लगातार हो रहे सामाजिक- पारिवारिक बिखराव को रोक सकेंगे। (निस्संदेह राम को निजी जागीर बनाने की किसी भी कोशिश के खिलाफ है मेरी राय)

संस्कार ही अपराध को रोक सकते हैं, सरकार नहीं!

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